कैंपटी जलग्रहण क्षेत्र में बढ़ा भू-कटाव का खतरा, जलस्रोतों और पहाड़ी ढलानों पर मंडरा रहा संकट
देहरादून: मसूरी के कैंपटी क्षेत्र के जलग्रहण क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव की बढ़ती संवेदनशीलता ने पर्यावरण और जलस्रोतों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ), देहरादून के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में क्षेत्र के कई हिस्सों को मिट्टी के कटाव के लिहाज से अधिक संवेदनशील पाया गया है।
यह अध्ययन करीब 904 हेक्टेयर क्षेत्र में किया गया, जहां औसत वार्षिक वर्षा लगभग 2,250 मिलीमीटर दर्ज की गई। वैज्ञानिकों ने पूरे क्षेत्र को चार सब-वाटरशेड में विभाजित कर स्थलाकृति, वनस्पति, मिट्टी के गुण, वर्षा और जलधाराओं समेत कई कारकों का विश्लेषण किया। अध्ययन में कुल 67 जलधाराओं की पहचान हुई, जिनकी संयुक्त लंबाई करीब 25.9 किलोमीटर है।
दो जलग्रहण क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील
अध्ययन के अनुसार एसडब्ल्यूएस-4 और एसडब्ल्यूएस-1 में मिट्टी के कटाव की संवेदनशीलता अपेक्षाकृत अधिक पाई गई। वैज्ञानिकों ने इन क्षेत्रों को संरक्षण के लिहाज से प्राथमिकता देने की जरूरत बताई है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि इन स्थानों पर निश्चित रूप से बड़े भूस्खलन होंगे। प्राथमिकता का मतलब है कि यहां प्राकृतिक परिस्थितियां मिट्टी के कटाव के लिए अधिक अनुकूल हैं और समय रहते संरक्षण उपाय किए जाने चाहिए।
मिट्टी की संरचना और तेज बारिश बढ़ा रही चुनौती
अध्ययन में क्षेत्र की मिट्टी मुख्य रूप से बलुई-दोमट पाई गई। इसमें औसतन 57 प्रतिशत रेत, 28 प्रतिशत गाद और 15 प्रतिशत चिकनी मिट्टी मिली। तेज बारिश के दौरान सतही बहाव बढ़ने पर मिट्टी की ऊपरी परत के साथ पोषक तत्व और जैविक पदार्थ भी बह सकते हैं।
वनस्पति इस प्रक्रिया को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पेड़ों और अन्य वनस्पतियों की जड़ें मिट्टी को बांधती हैं, जबकि पत्तियों की परत बारिश की बूंदों के सीधे प्रभाव और पानी की गति को कम करती है। इसलिए वन आवरण में कमी या कमजोर वनस्पति ढलानों की संवेदनशीलता बढ़ा सकती है।
जलधाराओं में बढ़ सकती है गाद
वैज्ञानिकों ने अधिक संवेदनशील हिस्सों में छोटी नालियों के कटाव, गहरी गूलियों, ढलानों की अस्थिरता और जलधाराओं के आसपास मिट्टी एवं मलबे के जमाव के संकेत पाए। मिट्टी के लगातार कटाव से जलधाराओं में गाद बढ़ सकती है, जिसका असर पानी की गुणवत्ता और जलस्रोतों की क्षमता पर पड़ सकता है।
कैंपटी जलग्रहण क्षेत्र मसूरी और आसपास के इलाकों के लिए महत्वपूर्ण है। यहां से निकलने वाली जलधाराएं स्थानीय जल उपलब्धता को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। ऐसे में भू-कटाव केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा से भी जुड़ा मुद्दा है।
संरक्षण पर देना होगा जोर
अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि केवल ढलान को देखकर किसी क्षेत्र की संवेदनशीलता तय नहीं की जा सकती। वैज्ञानिकों ने भूमि की आकृति, जलधाराओं का नेटवर्क, ऊंचाई, वन आवरण, मिट्टी के गुण और वर्षा की तीव्रता जैसे कई कारकों को संयुक्त रूप से विश्लेषण किया।
विशेषज्ञों के अनुसार संवेदनशील क्षेत्रों में वनस्पति संरक्षण, उचित जल निकासी व्यवस्था, छोटे जलग्रहण उपचार, ढलानों की निगरानी और मिट्टी संरक्षण उपायों को प्राथमिकता देना जरूरी है। पहाड़ी क्षेत्रों में मिट्टी का निर्माण बेहद धीमी प्रक्रिया है, इसलिए हर वर्ष होने वाला छोटा-सा कटाव भी लंबे समय में बड़ा पर्यावरणीय नुकसान पैदा कर सकता है।
